ThinkGO
मदद लें
भाषा: हिन्दी

सोच का जाल

सब-या-कुछ-नहीं: यह क्या है, रोज़मर्रा के उदाहरणों के साथ

अपडेट किया गया: 5 नवंबर 2026

सब-या-कुछ-नहीं
सिर्फ़ दो ही विकल्प देखना, बीच में कुछ नहीं।

यह जाल मिले-जुले नतीजे को एक फ़ैसले में बदल देता है। एक कमी उस सब पर पानी फेर देती है जो अच्छा रहा, और पूरा दिन, पूरा काम या पूरा रिश्ता “नाकामी” वाले ख़ाने में चला जाता है। असल ज़िंदगी के ज़्यादातर नतीजे किसी पैमाने पर कहीं बीच में होते हैं, और यह जाल उस पैमाने को छिपा देता है।

रोज़मर्रा के उदाहरण

  • दफ़्तर में

    “रिपोर्ट में एक आँकड़ा छूट गया, तो पूरी रिपोर्ट बेकार है।”

  • घर पर

    “मैंने एक समोसा खा लिया, अब सेहत वाला पूरा हफ़्ता बर्बाद हो गया।”

  • अपने बारे में

    “अगर हर समय मन शांत नहीं रहता, तो मुझसे कुछ भी नहीं सँभल रहा।”

विचार को जाँचने के सवाल

ThinkGO के सुकराती प्रश्नों से। एक या दो चुन लें; सबकी ज़रूरत नहीं है।

  1. किन बातों से लगता है कि यह विचार सच है? किन बातों से लगता है कि नहीं?
  2. क्या जो हुआ उसे देखने का कोई और तरीका है?
  3. अगर किसी दोस्त के मन में यह विचार हो, तो आप उससे क्या कहेंगे?

एक ज़्यादा निष्पक्ष विकल्प

जाल

“एक आँकड़ा छूट गया, तो पूरी रिपोर्ट बेकार है।”

ज़्यादा निष्पक्ष विचार

“रिपोर्ट में एक ग़लती है, जिसे ठीक किया जा सकता है। बाकी रिपोर्ट अब भी अपना काम करती है।”

मददगार अभ्यास

स्रोत

  • Beck, A. T. (1976). Cognitive Therapy and the Emotional Disorders. International Universities Press.
  • Burns, D. D. (1980). Feeling Good: The New Mood Therapy. William Morrow.

पढ़ने के लिए पृष्ठभूमि सामग्री। इस पेज की परिभाषाएँ, उदाहरण और सवाल हमारे अपने शब्दों में हैं।